Skip to main content

पत्रकार अभिसार शर्मा ने शेयर की बीजेपी सांसद मनोज तिवारी के सामने तिरंगे पर बैठे हैं बीजेपी कार्यकर्ता..



  दिल्ली। वरिष्ठ पत्रकार और ABP न्यूज के एंकर अभिसार शर्मा ने अपने ट्विटर अकाउंट से दो ऐसी तस्वीर शेयर की है। जिसके बाद से सोशल मीडिया पर बीजेपी नेताओं का फजीहत होनी शुरु हो गई है।
दरअसल, पत्रकार अभिसार शर्मा ने मंगलवार (30 जनवरी) को अपने ट्विटर अकाउंट से दो तस्वीर शेयर की है, जो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहीं है। पहली तस्वीर में उत्तर पूर्व दिल्ली से भारतीय जनता पार्टी(बीजेपी) के सांसद और दिल्ली बीजेपी अध्यक्ष मनोज तिवारी की मौजूदगी में उनके कथित समर्थक तिरंगे पर बैठे हैं।
वहीं, दूसरी तस्वीर में कासगंज हिंसा में मारे गए चंदन गुप्‍ता की याद में आयोजित श्रद्धांजलि सभा में भाजपा नेता हंस रहे हैं। इसके साथ अभिसार शर्मा ने लिखा कि, ‘इन दो तस्‍वीरों में न तिरंगे की तौहीन है न दिवंगत चंदन गुप्‍ता की आत्‍मा की। क्‍यों मित्रों?’ हांलाकी, पत्रकार अभिसार शर्मा ने इस बात का जिक्र नहीं किया है कि दिल्ली बीजेपी अध्यक्ष मनोज तिवारी की यह तस्वीर कब की है। यह तस्वीर कब की है’ इस की पुष्टि नहीं की जी रही है। लेकिन, दूसरी तस्वीर उस समय की है जब कासगंज हिंसा में मारे गए युवक चंदन गुप्‍ता की याद में रविवार को आयोजित श्रद्धांजलि सभा में बीजेपी नेता हंसते हुए दीप जला रहें थे। पत्रकार अभिसार शर्मा का ट्वीट सामने आते ही सोशल मीडिया पर लोगों ने बीजेपी की अलोचना करना शुरु कर दी है। वहीं, एक यूजर ने लिखा कि, ‘भाजपा सिर्फ राष्ट्रवाद को एक हथियार के रूप में देखती है, और जब भी कभी मौका मिलता है ये राष्ट्र की तौहीन करने के बाद मुस्लिमो पर टूट पड़ती है’। वहीं, एक अन्य यूजर ने लिखा कि, ‘सर जी कई दशको तक तिरंगे का अपमान करने वाले आज देशभक्ति के सर्टिफिकेट बांट रहे है।’

Comments

Popular posts from this blog

चार लोकसभा और 10 विधानसभा उपचुनाव के नतीजे थोड़ी देर में, कैराना सीट पर सबकी है नजर

 पालघर। देश के 4 लोकसभा और 10 विधानसभा सीटों पर सोमवार को हुए उपचुनाव के नतीजे आज बृहस्पतिवार को आएंगे। बृहस्पतिवार सुबह 8 बजे इन सभी सीटों पर मतों की गिनती शुरू हो चुकी है। इन सभी सीटों में से सबसे ज्यादा नजर उत्तर प्रदेश की कैराना लोकसभा सीट पर रहेगी। यहां बीजेपी को हराने के लिए विपक्षी पार्टियां रालोद उम्मीदवार का समर्थन कर रही हैं। 2019 लोकसभा चुनाव की ओर बढ़ रहे देश में विपक्षी पार्टियां कैराना में बीजेपी को हरा कर एक बड़ा संदेश देना चाहती हैं। सोमवार को हुए मतदान में काफी जगह ईवीएम-वीवीपैट में गड़बड़ी की खबरें आई थीं, जिसके बाद यूपी की कैराना, महाराष्ट्र की भंडारा-गोंदिया लोकसभा और नगालैंड की एक विधानसभा सीट के कुछ पोलिंग बूथों पर दोबारा वोट डलवाए गए थे। कैराना से भाजपा सांसद हुकुम सिंह और नूरपुर में भाजपा विधायक लोकेंद्र चौहान के निधन के कारण उप चुनाव हो रहे हैं। कैराना लोकसभा सीट के उपचुनाव पर देश के राजनीतिक दलों की निगाहें हैं। क्योंकि 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले हो रहे इस चुनाव की नतीजे देश की सियासत को नया संदेश देने वाले हैं। गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा सीट क...

महाराष्ट्र से वापस लौट सकेंगे प्रवासी मजदूर,डीएम की अनुमति होगी जरूरी

मुंबई। लॉकडाउन की वजह से देशभर में लॉकडाउन लागू है. अलग-अलग राज्यों के मजदूर और लोग दूसरे राज्यों में फंस गए हैं. महाराष्ट्र के गृह मंत्री अनिल देशमुख गुरुवार को कहा कि प्रवासी और अन्य फंसे हुए लोग अपने-अपने राज्यों में जिला मजिस्ट्रेट की अनुमति के बाद वापस लौट जाएंगे. जिला मजिस्ट्रेट ही प्रवासी मजदूरों को वापस भेजने के लिए नोडल अधिकारी की भूमिका में होंगे. लोगों को नाम, मोबाइल नंबर, गाड़ियों का विवरण(अगर हो तो), राज्य में अकेले हैं या साथ में हैं, इन सबका क्रमवार ब्यौरा देना होगा. महाराष्ट्र में लॉकडाउन की घोषणा के बाद लगभग 6 लाख मजदूर फंसे हैं. ये मजदूर बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड और ओडिशा के हैं. इस वक्त इन मजदूरों के रहने-खाने की जिम्मेदारी महाराष्ट्र सरकार पर है. हालांकि कुछ मजदूर अपने गृह राज्य जाने की मांग कर रहे हैं. अब गृह मंत्रालय की ओर से जारी नई गाइडलाइन के मुताबिक मजदूर अपने राज्यों को लौट सकेंगे. राज्य इसके लिए तैयारी कर रहे हैं. दरअसल बिहार, झारखंड, महाराष्ट्र जैसे कुछ राज्यों की मांग के बाद गृह मंत्रालय ने अलग-अलग स्थानों पर फंसे हुए प्रवासी मजदूरों, लोगों और ...

पीएम मोदी के कार्यकाल की सबसे बड़ी मुश्किल 18 फरवरी को आएगी

दिल्ली। देश के और सभी प्रधानमंत्रियों की तरह नरेंद्र मोदी भी जब प्रधानमंत्री बने, तो उन्होंने अपने मन मुताबिक कुछ फैसले किए. हर प्रधानमंत्री की तरह उन्हें भी समर्थन और विरोध झेलना पड़ा. हालिया सबसे बड़े फैसलों जैसे नोटबंदी और जीएसटी के बाद उनके समर्थन और विरोध का दौर जारी है. चुनाव में जीत के साथ ही विरोध की आवाज थोड़ी धीमी होती है और समर्थन की आवाज तेज हो जाती है. फिर अगला चुनाव आता है और फिर से यही प्रक्रिया दुहराई जाती है. नरेंद्र मोदी कोई पहले ऐसे प्रधानमंत्री नहीं हैं, जो इन मुसीबतों से दो चार हो रहे हैं. हर नेता के साथ यही होता रहा है. चाहे वो इंदिरा गांधी के बैंकों के राष्ट्रीयकरण का मसला हो, नरसिम्हा राव के मुक्त अर्थव्यवस्था का मसला हो या फिर मनमोहन सिंह का अमेरिका के साथ परमाणु करार का, चुनाव के दौरान विरोध बढ़ता ही रहा है. अगर चुनाव जीत गए तो आवाज दब जाती है और अगर हार गए तो इस आवाज को और भी बल मिलता है. कुछ ऐसी ही स्थिति आंदोलनों की भी होती है. कई ऐसे आंदोलन होते हैं, जो सरकारों को घुटने टेकने पर मजबूर कर देते हैं. वहीं कुछ आंदोलन मौसमी होते हैं. चुनावी मौसम में सिर...