Skip to main content

ओपी सिंह उत्तर प्रदेश के नए पुलिस महानिदेशक,तीन जनवरी को संभालेंगे पद..



लखनऊ। केंद्र में डीजी सीआइएसएफ के पद पर तैनात उत्तर प्रदेश कैडर के आइपीएस अधिकारी  ओमप्रकाश सिंह उत्तर प्रदेश पुलिस के नए महानिदेशक होंगे। ओपी सिंह आज रिटायर हो रहे सुलखान सिंह की जगह लेंगे। ओपी सिंह के पास डीजीपी पद पर काम करने का लंबा समय है।
उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार एक ऐसे अफसर की तलाश कर रही थी जिसके पास आगामी लोकसभा चुनाव कराने तक का लंबा समय हो। सरकार के हिसाब से ओपी सिंह कसौटी पर खरा उतरते हैं। मुख्य सचिव राजीव कुमार की अध्यक्षता में प्रमुख सचिव गृह अरविंद कुमार तथा प्रमुख सचिव मुख्यमंत्री शशि प्रकाश गोयल की कमेटी ने ओपी सिंह के पुलिस महानिदेशक के पद के नाम पर मुहर लगाई।
कमेटी की संस्तुति पर 1983 बैच के आइपीएस अधिकारी ओपी सिंह को प्रदेश का नया पुलिस प्रमुख नियुक्त किया गया है। इसके साथ ही आनंद कुमार को एडीजी लॉ एंड आर्डर बनाया गया है। प्रदेश सरकार ने नए डीजीपी के कार्यभार ग्रहण करने तक एडीजी कानून व्यवस्था आनंद कुमार को डीजीपी का कार्यभार संभालने का आदेश दिया है। रविवार को दोपहर में ही डीजीपी सुलखान सिंह ने उन्हें कार्यभार सौंप दिया।
प्रदेश के प्रमुख सचिव गृह अरविंद कुमार ने बताया कि ओपी सिंह प्रदेश पुलिस के महानिदेशक का पद तीन जनवरी को संभालेंगे। केंद्र सरकार की कार्यवाही पूरी होने में दो-तीन दिन लग सकते हैं। इस मामले में ओपी सिंह सरकार की प्राथमिकता में फिट बैठ रहे थे। उनका कार्यकाल जनवरी 2020 तक है। इसके अलावा वरिष्ठता सूची के हिसाब से डीजीपी पद के पहले दावेदार प्रवीण सिंह का कार्यकाल जून 2018 तक है। वर्ममान में वह डीजी फायर के पद पर तैनात हैं।
यूपी डीजीपी की रेस में बड़ा फेरबदल किया गया है। आईपीएस ओपी सिंह को डीजीपी बनाया गया है। 1983 बैच के आईपीएस अफसर ओपी सिंह को आज चेन्नई से अचानक लखनऊ बुलाया गया है। ओपी सिंह के अलावा कई नामों की चर्चा थी। जिनमें प्रवीण सिंह, शिव कुमार शुक्ला, भावेश कुमार सिंह और रजनीकांत मिश्रा भी पंक्ति में थे। सीएम योगी आदित्यनाथ ने 1983 बैच के आईपीएस ओपी सिंह पर भरोसा जताया।ओपी सिंह को अचानक लखनऊ बुलाया गया है, वो चेन्नई से यहां पहुंचेंगे। वरिष्ठता के मामले में ओपी सिंह सबसे लंबे कार्यकाल वाले 7वें नंबर के अफसर हैं। लंबा कार्यकाल और अनुभव ही उनके लिए लिए मुफीद रहा। पदभार संभालने के बाद वो ढाई साल तक उत्तर प्रदेश में डीजीपी के पद पर रहेंगे।
योगी सरकार में बदमाशों और अपराधियों के खिलाफ सख्त कदम उठाए गए हैं, लेकिन फिर भी नए डीजीपी के लिए सबसे बड़ी चुनौती प्रदेश में कानून व्यवस्था को ट्रैक पर लाने की होगी। सरकार के 10 महीने के कार्यकाल में करीब 1000 एनकाउंटर कर 2,000 से अधिक अपराधियों को जेल में पहुंचाया गया है। ओपी सिंह डीजी सीआईएसएफ के पद पर केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर हैं। ओपी सिंह सीनीयरटी में सबसे लंबे कार्यकाल वाले सातवें नंबर के अफसर हैं। उनके पास लंबा कार्यकाल और अनुभव बना है। ओपी सिंह के पास काम करने के लिए ढ़ाई साल का लंबा वक्त है। योगी आदित्यनाथ सरकार एक ऐसे अफसर की तलाश कर रही थी जिसके पास आगामी लोकसभा चुनाव कराने तक का लंबा वक्त है। सरकार के हिसाब से ओपी सिंह कसौटी पर खरा उतरते हैं।  ओपी सिंह ने केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (सीआईएसएफ) के डीजी के पद पर तैनात है। सीआईएसएफ के पास देश के महत्वपूर्ण औद्योगिक और परमाणु प्रतिष्ठानों, नागरिक हवाई अड्डों व मेट्रो की रक्षा करने की जिम्मेदारी है। ओपी सिंह उत्तर प्रदेश कैडर के 1983 बैच अधिकारी हैं, जो राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (एनडीआरएफ) के महानिदेशक के रूप में सेवा कर रहे थे। उनका कार्यकाल जनवरी 2020 तक है। वीरता के लिए राष्ट्रपति के पुलिस पदक प्राप्त ओपी सिंह एकमात्र डीजी रैंक के अधिकारी हैं। उनको एनडीआरएफ में कुछ बेहतरीन मानक संचालन प्रक्रियाओं की शुरुआत करने के लिए श्रेय दिया गया है और बड़े पैमाने के दौरान मैदान पर अपने लोगों का नेतृत्व किया है। नेपाल भूकंप बचाव और राहत कार्यों पिछले वर्ष उन्होंने एसपीजी, सीआरपीएफ व सीआईएसएफ में पहले सेवा की थी। वह राष्ट्रीय रक्षा अकादमी के छात्र रहे हैं और और आपदा प्रबंधन में एमबीए की डिग्री उन्हें प्राप्त है।
ओपी सिंह बिहार के गया जिले के रहने वाले हैं। वर्तमान में सीआईएसएफ डीजी के पद पर तैनात हैं। महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों के साथ सीआईएसएफ को दिल्ली मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन, अति महत्वपूर्ण व्यक्ति (VIP) सुरक्षा, आपदा प्रबंधन तथा हैती में यूएन की सशस्त्र व पुलिस यूनिट (FPU) स्थापना की सुरक्षा करने जैसे कार्य भी हाल ही में को सौंपे गए थे। 1983 बैच के आईपीएस ओमप्रकाश सिंह मूल रूप से गया, बिहार के निवासी हैं।

Comments

Popular posts from this blog

चार लोकसभा और 10 विधानसभा उपचुनाव के नतीजे थोड़ी देर में, कैराना सीट पर सबकी है नजर

 पालघर। देश के 4 लोकसभा और 10 विधानसभा सीटों पर सोमवार को हुए उपचुनाव के नतीजे आज बृहस्पतिवार को आएंगे। बृहस्पतिवार सुबह 8 बजे इन सभी सीटों पर मतों की गिनती शुरू हो चुकी है। इन सभी सीटों में से सबसे ज्यादा नजर उत्तर प्रदेश की कैराना लोकसभा सीट पर रहेगी। यहां बीजेपी को हराने के लिए विपक्षी पार्टियां रालोद उम्मीदवार का समर्थन कर रही हैं। 2019 लोकसभा चुनाव की ओर बढ़ रहे देश में विपक्षी पार्टियां कैराना में बीजेपी को हरा कर एक बड़ा संदेश देना चाहती हैं। सोमवार को हुए मतदान में काफी जगह ईवीएम-वीवीपैट में गड़बड़ी की खबरें आई थीं, जिसके बाद यूपी की कैराना, महाराष्ट्र की भंडारा-गोंदिया लोकसभा और नगालैंड की एक विधानसभा सीट के कुछ पोलिंग बूथों पर दोबारा वोट डलवाए गए थे। कैराना से भाजपा सांसद हुकुम सिंह और नूरपुर में भाजपा विधायक लोकेंद्र चौहान के निधन के कारण उप चुनाव हो रहे हैं। कैराना लोकसभा सीट के उपचुनाव पर देश के राजनीतिक दलों की निगाहें हैं। क्योंकि 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले हो रहे इस चुनाव की नतीजे देश की सियासत को नया संदेश देने वाले हैं। गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा सीट क...

महाराष्ट्र से वापस लौट सकेंगे प्रवासी मजदूर,डीएम की अनुमति होगी जरूरी

मुंबई। लॉकडाउन की वजह से देशभर में लॉकडाउन लागू है. अलग-अलग राज्यों के मजदूर और लोग दूसरे राज्यों में फंस गए हैं. महाराष्ट्र के गृह मंत्री अनिल देशमुख गुरुवार को कहा कि प्रवासी और अन्य फंसे हुए लोग अपने-अपने राज्यों में जिला मजिस्ट्रेट की अनुमति के बाद वापस लौट जाएंगे. जिला मजिस्ट्रेट ही प्रवासी मजदूरों को वापस भेजने के लिए नोडल अधिकारी की भूमिका में होंगे. लोगों को नाम, मोबाइल नंबर, गाड़ियों का विवरण(अगर हो तो), राज्य में अकेले हैं या साथ में हैं, इन सबका क्रमवार ब्यौरा देना होगा. महाराष्ट्र में लॉकडाउन की घोषणा के बाद लगभग 6 लाख मजदूर फंसे हैं. ये मजदूर बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड और ओडिशा के हैं. इस वक्त इन मजदूरों के रहने-खाने की जिम्मेदारी महाराष्ट्र सरकार पर है. हालांकि कुछ मजदूर अपने गृह राज्य जाने की मांग कर रहे हैं. अब गृह मंत्रालय की ओर से जारी नई गाइडलाइन के मुताबिक मजदूर अपने राज्यों को लौट सकेंगे. राज्य इसके लिए तैयारी कर रहे हैं. दरअसल बिहार, झारखंड, महाराष्ट्र जैसे कुछ राज्यों की मांग के बाद गृह मंत्रालय ने अलग-अलग स्थानों पर फंसे हुए प्रवासी मजदूरों, लोगों और ...

पीएम मोदी के कार्यकाल की सबसे बड़ी मुश्किल 18 फरवरी को आएगी

दिल्ली। देश के और सभी प्रधानमंत्रियों की तरह नरेंद्र मोदी भी जब प्रधानमंत्री बने, तो उन्होंने अपने मन मुताबिक कुछ फैसले किए. हर प्रधानमंत्री की तरह उन्हें भी समर्थन और विरोध झेलना पड़ा. हालिया सबसे बड़े फैसलों जैसे नोटबंदी और जीएसटी के बाद उनके समर्थन और विरोध का दौर जारी है. चुनाव में जीत के साथ ही विरोध की आवाज थोड़ी धीमी होती है और समर्थन की आवाज तेज हो जाती है. फिर अगला चुनाव आता है और फिर से यही प्रक्रिया दुहराई जाती है. नरेंद्र मोदी कोई पहले ऐसे प्रधानमंत्री नहीं हैं, जो इन मुसीबतों से दो चार हो रहे हैं. हर नेता के साथ यही होता रहा है. चाहे वो इंदिरा गांधी के बैंकों के राष्ट्रीयकरण का मसला हो, नरसिम्हा राव के मुक्त अर्थव्यवस्था का मसला हो या फिर मनमोहन सिंह का अमेरिका के साथ परमाणु करार का, चुनाव के दौरान विरोध बढ़ता ही रहा है. अगर चुनाव जीत गए तो आवाज दब जाती है और अगर हार गए तो इस आवाज को और भी बल मिलता है. कुछ ऐसी ही स्थिति आंदोलनों की भी होती है. कई ऐसे आंदोलन होते हैं, जो सरकारों को घुटने टेकने पर मजबूर कर देते हैं. वहीं कुछ आंदोलन मौसमी होते हैं. चुनावी मौसम में सिर...