Skip to main content

कथित समाजसेवी परवेज मेकरानी ने बुजुर्ग व्यक्ति बेवकूफ बना कर, पांच सौ रुपये का छुट्टा मांगा और लेकर चलता बना




 मुंब्रा। कौसा रशीद कंपाऊड परिसर मे पान की दुकान चलाने वाले अंसारी फरीद अहमद नामक बुजुर्ग व्यक्ति
से क्षेत्र का कथित समाज सेवक परवेज मेकरानी ने
बेवकुफ बनाकर पांच सौ रुपए का छुट्टा मांगा और लेकर चलता बना। अंसारी फरीद अहमद ने बताया कि परवेज मेकरानी
एक दिन रात को मेरे पान की दुकान पर आया और बोला मामू पांच सौ रूपये का छुट्टा है तो दो, मैंने गल्ले से पांच सौ रूपये का छुट्टा निकाला और उसे दे दिया, छुट्टा लेते ही परवेज यह बोल कर चलता बना कि अभी सामने से पांच सौ की नोट लाकर देता हूँ, लेकिन जब वह कई रोज नहीं आया तो यह बात अपने बेटे को बताया। तो मेरा बेटा परवेज मेकरानी की तलाश में लग गया, उसी दौरान मेकरानी मुझे दिख गया तो मैंने पांच सौ रूपये मांगा तो बोलने लगा मामू लाकर देता हूँ। फिर मैं उसे बहुत गाली गलौज किया और उसे बोला तू मुझे बेवकुफ बनाकर पांच सौ रूपये का छुट्टा मांगा और लेकर चलता बना। इसके 15 दिनों बाद मेरा बेटा परवेज मेकरानी के घर गया और उसे पकड़ा, जिसके बाद वह किसी पड़ोसी से कर्जा लेकर मेरा पांच सौ रुपये देने के बाद मेरी पान दुकान तोड़वा देने जैसे कई धमकियाँ दिया। अंसारी फरीद अहमद ने बताया कि इन्हीं हरकतों के कारण मेकरानी कई बार पीट चुका है। कुछ दिनों पहले एक पडोस की चालियों में रहने वाली छह सात औरतों ने परवेज मेकरानी की जमकर पीटाई कर दी थी, क्योंकि उन्हें भी हमारे तरह बेवकुफ बनाकर उनसे कुछ मोटी रकम ठग लिया था। बुजुर्ग अंसारी फरीद अहमद ने कहा कि मैं इतना ही कहूगां वह आदमी अच्छा नहीं है हर किसी को बेवकुफ बनाकर ठगी का काम करता है। उसी दौरान वहां खड़े कुछ मौजूद लोगों ने मेकरानी की करतुतों और पीटाई की बात बताते हुए कहा कि वह किसी का नहीं है कभी इसकी गीवत तो कभी उसकी गीवत करते मिल ही जाएगा। पीछले नगरसेवक चुनाव में कांग्रेसी उम्मीदवार महिला को खूब चुना लगाया, उनसे पैसे ऐंठन के बाद जब दसरे उम्मीदवार से ज्यादा पैसे मिल गया तो उनके साथ घूमने लगा। जब उस कांग्रेसी उम्मीदवार महिला का नहीं हुआ तो वह किसी का नहीं हो सकता, क्योंकि शुरू- शुरू में उस कांग्रेसी महिला को अपना रिश्तेदार बताता था, लेकिन जैसे ही दूसरे उम्मीदवार से मोटी रकम मिल गई, तो अपने कथित रिश्तेदार महिला की गीवत करने से नहीं थक रहा था। इसी प्रकार गुजरे चुनाव के दौरान कुछ उम्मीदवारों से मोटी रकम ऐंठ कर कल्याण फाटा रोड स्थित कुनाल लाज मे रुम बुक कर वहां रहने लगा,  मेकरानी नशे की हालत में वहां बैठे कांग्रेस समेत अन्य पार्टियों और उम्मीदवारों की बुराई करते पाया गया। लेकिन आजाद उम्मीदवार अंगुठी और टोपी निशानी वाले कार्यकर्ताओं ने कुनाल लाज पहुँच कर मेकरानी की जमकल पीटाई कर के बेहोश कर दिया था। उस दौरान लाज के वेटरों ने उसे काफी बचाने की कोशिश की लेकिन आजाद उम्मीदवारों के गुस्साए कार्यकर्ता उसकी जमकर पीटाई कर के चले गये। स्थानीय लोगों ने बताया कि मेकरानी अपने नशे के लत के कारण कई लोगों के हाथों कई बार पीट चुका है, उसके बाद भी वह अपनी हरकतों और करतुतों से बाज नहीं आता और हर किसी को मिरा- भायंदर के एक वरिष्ठ कांग्रेसी नेता के अलावा ठाणे के कुछ कांग्रेसी नेताओं के नाम से सबको डराते और धमकाते रहता है। उन नेताओं के बारे में हर किसी से बोलते रहता है कि मै जैसा कहूंगा वह लोग वैसा ही करेंगे, क्योंकि वह लोग हमारे बहुत खासमखास नेता हैं।
लगे इन सभी आरोपों के सबंध मे जब परवेज मेकरानी से संपर्क किया गया तो मेकरानी से संपर्क नहीं हो पाया।

Comments

Popular posts from this blog

चार लोकसभा और 10 विधानसभा उपचुनाव के नतीजे थोड़ी देर में, कैराना सीट पर सबकी है नजर

 पालघर। देश के 4 लोकसभा और 10 विधानसभा सीटों पर सोमवार को हुए उपचुनाव के नतीजे आज बृहस्पतिवार को आएंगे। बृहस्पतिवार सुबह 8 बजे इन सभी सीटों पर मतों की गिनती शुरू हो चुकी है। इन सभी सीटों में से सबसे ज्यादा नजर उत्तर प्रदेश की कैराना लोकसभा सीट पर रहेगी। यहां बीजेपी को हराने के लिए विपक्षी पार्टियां रालोद उम्मीदवार का समर्थन कर रही हैं। 2019 लोकसभा चुनाव की ओर बढ़ रहे देश में विपक्षी पार्टियां कैराना में बीजेपी को हरा कर एक बड़ा संदेश देना चाहती हैं। सोमवार को हुए मतदान में काफी जगह ईवीएम-वीवीपैट में गड़बड़ी की खबरें आई थीं, जिसके बाद यूपी की कैराना, महाराष्ट्र की भंडारा-गोंदिया लोकसभा और नगालैंड की एक विधानसभा सीट के कुछ पोलिंग बूथों पर दोबारा वोट डलवाए गए थे। कैराना से भाजपा सांसद हुकुम सिंह और नूरपुर में भाजपा विधायक लोकेंद्र चौहान के निधन के कारण उप चुनाव हो रहे हैं। कैराना लोकसभा सीट के उपचुनाव पर देश के राजनीतिक दलों की निगाहें हैं। क्योंकि 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले हो रहे इस चुनाव की नतीजे देश की सियासत को नया संदेश देने वाले हैं। गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा सीट क...

महाराष्ट्र से वापस लौट सकेंगे प्रवासी मजदूर,डीएम की अनुमति होगी जरूरी

मुंबई। लॉकडाउन की वजह से देशभर में लॉकडाउन लागू है. अलग-अलग राज्यों के मजदूर और लोग दूसरे राज्यों में फंस गए हैं. महाराष्ट्र के गृह मंत्री अनिल देशमुख गुरुवार को कहा कि प्रवासी और अन्य फंसे हुए लोग अपने-अपने राज्यों में जिला मजिस्ट्रेट की अनुमति के बाद वापस लौट जाएंगे. जिला मजिस्ट्रेट ही प्रवासी मजदूरों को वापस भेजने के लिए नोडल अधिकारी की भूमिका में होंगे. लोगों को नाम, मोबाइल नंबर, गाड़ियों का विवरण(अगर हो तो), राज्य में अकेले हैं या साथ में हैं, इन सबका क्रमवार ब्यौरा देना होगा. महाराष्ट्र में लॉकडाउन की घोषणा के बाद लगभग 6 लाख मजदूर फंसे हैं. ये मजदूर बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड और ओडिशा के हैं. इस वक्त इन मजदूरों के रहने-खाने की जिम्मेदारी महाराष्ट्र सरकार पर है. हालांकि कुछ मजदूर अपने गृह राज्य जाने की मांग कर रहे हैं. अब गृह मंत्रालय की ओर से जारी नई गाइडलाइन के मुताबिक मजदूर अपने राज्यों को लौट सकेंगे. राज्य इसके लिए तैयारी कर रहे हैं. दरअसल बिहार, झारखंड, महाराष्ट्र जैसे कुछ राज्यों की मांग के बाद गृह मंत्रालय ने अलग-अलग स्थानों पर फंसे हुए प्रवासी मजदूरों, लोगों और ...

पीएम मोदी के कार्यकाल की सबसे बड़ी मुश्किल 18 फरवरी को आएगी

दिल्ली। देश के और सभी प्रधानमंत्रियों की तरह नरेंद्र मोदी भी जब प्रधानमंत्री बने, तो उन्होंने अपने मन मुताबिक कुछ फैसले किए. हर प्रधानमंत्री की तरह उन्हें भी समर्थन और विरोध झेलना पड़ा. हालिया सबसे बड़े फैसलों जैसे नोटबंदी और जीएसटी के बाद उनके समर्थन और विरोध का दौर जारी है. चुनाव में जीत के साथ ही विरोध की आवाज थोड़ी धीमी होती है और समर्थन की आवाज तेज हो जाती है. फिर अगला चुनाव आता है और फिर से यही प्रक्रिया दुहराई जाती है. नरेंद्र मोदी कोई पहले ऐसे प्रधानमंत्री नहीं हैं, जो इन मुसीबतों से दो चार हो रहे हैं. हर नेता के साथ यही होता रहा है. चाहे वो इंदिरा गांधी के बैंकों के राष्ट्रीयकरण का मसला हो, नरसिम्हा राव के मुक्त अर्थव्यवस्था का मसला हो या फिर मनमोहन सिंह का अमेरिका के साथ परमाणु करार का, चुनाव के दौरान विरोध बढ़ता ही रहा है. अगर चुनाव जीत गए तो आवाज दब जाती है और अगर हार गए तो इस आवाज को और भी बल मिलता है. कुछ ऐसी ही स्थिति आंदोलनों की भी होती है. कई ऐसे आंदोलन होते हैं, जो सरकारों को घुटने टेकने पर मजबूर कर देते हैं. वहीं कुछ आंदोलन मौसमी होते हैं. चुनावी मौसम में सिर...