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बीजेपी इन छह राज्यों में लड़खड़ा रही है, जहां मिली थीं लोकसभा में 205 सीटें




यूपी, एमपी, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में लोकसभा की 145 सीटें हैं। ये वो बड़े राज्य हैं जहां बीजेपी अपने बूते पर चुनाव मैदान में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने का माद्दा रखती है।
पिछले चुनाव में इन राज्यों से बीजेपी ने अपने खाते में 133 सीटें हासिल की थीं। सहयोगी दलों को लेकर यह संख्या 135 थी। अगर महाराष्ट्र और बिहार को भी जोड़ लें, जहां बीजपी ने सहयोगी दलों के साथ मिलकर शानदार प्रदर्शन किया था, तो इन 6 राज्यों की कुल 238 सीटों में से बीजेपी के पास 178 और सहयोगी दलों के साथ मिलकर 205 सीटें हैं। सवाल यही है कि इन छह राज्यों में क्या बीजेपी अपने बूते या फिर सहयोगी दलों के दम पर यह चमत्कारिक प्रदर्शन दोहरा पाएगी? अगर नहीं, तो सत्ता में वापसी का मार्ग मिलना मुश्किल ही नहीं, असम्भव लगता है।
उत्तर प्रदेश में मुश्किल में बीजेपी,
उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा सूबा है। यहां बीजेपी को 80 में से 71 सीटें और उसके सहयोगी दलों को 2 यानी एनडीए को 73 सीटें मिली थीं। यूपी देश में महाराष्ट्र के बाद दूसरा ऐसा राज्य है जहां चतुष्कोणीय मुकाबला होता है। बीजेपी के लिए फर्क ये है कि महाराष्ट्र में उसके साथ सहयोगी शिवसेना रही है, जबकि यूपी में उसे अपना दल सरीखे बहुत छोटी एक-दुक्का पार्टियों को छोड़ दें तो अकेले ही चुनाव लड़ना पड़ता है। बीते लोकसभा चुनाव में बीजेपी उत्तर प्रदेश में 42.63 प्रतिशत वोट मिले थे।
एसपी, बीएसपी और कांग्रेस के मुकाबले यह फर्क इतना बड़ा था कि बीजेपी की एकतरफा और जबरदस्त जीत हुई थी। मगर, 2019 में एसपी और बीएसपी मिलकर चुनाव लड़ने वाले हैं। उस स्थिति में अगर एसपी को मिले 22.35 प्रतिशत और बीएसपी को मिले 19.77 प्रतिशत वोटों को जोड़कर देखें तो यह 41.12 प्रतिशत हो जाता है। हालांकि तब भी डेढ फीसदी वोट से बीजेपी आगे रहती है। मगर, सीटों के हिसाब से इससे बीजेपी के प्रदर्शन में जबरदस्त गिरावट आना तय है।
एसपी और बीएसपी के साथ आने के बाद का प्रभाव इतना ज्यादा होता है कि बीजेपी गोरखपुर और फूलपुर जैसी सीटें भी हार जाती हैं जहां बीजपी को 50 फीसदी से ज्यादा वोट मिले थे।
अगर कांग्रेस के साथ भी एसपी-बीएसपी का तालमेल हो जाता है तो उनके वोटों में 7.53 प्रतिशत की और बढ़ोतरी हो जाएगी। इसका मतलब ये होगा कि एसपी-बीएसपी-कांग्रेस के पास 48.68 फीसदी वोट होंगे।
हालांकि कहा जाता है कि राजनीति में 2+2 हमेशा 4 नहीं हुआ करते। मगर, यह बात भी उतनी ही सही है कि राजनीति में हमेशा 2+2 जुड़कर 3 भी नहीं होते। यह 6 भी हो सकता है। ये नतीजे पूरी तरह से जनता की सोच पर निर्भर करता है कि वह गठबंधन को किस नजरिए से देखती है।
चूकि बीजेपी के पास 80 में से 71 सीटे हैं इसलिए विरोधी दलों के एकजुट होने का असर उस पर पड़ेगा। मगर, क्या यह बीजेपी के ख़िलाफ़ रिवर्स स्वीप होगा, यही बड़ा सवाल है। अगर बीजेपी यूपी में विरोधी गठबंधन के सामने धराशायी होती है तो टैली इतनी बड़ी है कि बीजेपी अपने बूते सरकार बनाने की स्थिति तो छोड़िए, सहयोगी दलों के साथ मिलकर भी सरकार बनाने की स्थिति में नहीं रह पाएगी।
बिहार में कड़ी टक्कर, जेडीयू के साथ आने से बीजेपी को राहत,
बीजेपी के लिए सकारात्मक सिर्फ बिहार में हुआ है जहां विगत चुनाव में 16 फीसदी वोट लाने वाली जेडीयू अब एनडीआ का हिस्सा है। हालांकि 3 लोकसभा सीटें हासिल करने वाली आरएलएसपी उससे छिटक भी चुकी है। फिर भी, बीजेपी फायदे में है। हालांकि विगत चुनाव के मुकाबले विरोधी भी महागठबंधन बनाकर सामने हैं। बिहार में एनडीए और महागठबंधन के बीच सीधे मुकाबले की स्थिति बनने पर कांटे की टक्कर होगी, फिर भी एनडीए के लिए 40 में से 31 सीटें निकालने का करिश्मा कर पाना मुश्किल लगता है। सीटें घटेंगी, ये तय है।
हिन्दी Heart लैंड ने बीजेपी को Hurt किया,
हिन्दी हर्ट लैड यानी मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान को लें, तो यहां बीजेपी के पास 65 लोकसभा सीटों में से 62 सीटें हैं। यानी 2019 में इन प्रदेशों में भी बीजेपी को पाने के लिए कुछ भी नहीं है और खोने के लिए तो सारी दुनिया है। विधानसभा चुनावों में बीजेपी तीनों राज्य गंवा चुकी है। हालांकि बीजेपी के लिए संतोष की बात यही है कि मध्यप्रदेश में उसके वोट कांग्रेस से मामूली रूप से ज्यादा हैं। मगर, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में पार्टी के वोट प्रतिशत में भी भारी गिरावट आयी है।
बीजेपी के लिए चाहे जितना सकारात्मक सोच लिया जाए और यह मान लिया जाए कि विधानसभा और लोकसभा चुनाव का स्वभाव अलग-अलग होता है, फिर भी इन राज्यों में बीजेपी को लोकसभा चुनाव वाला प्रदर्शन बरकरार रखने के लिए नाकों चने चबाने होंगे।
महाराष्ट्र में कुनबा नहीं सम्भाल पा रही है बीजेपी,
महाराष्ट्र में बीजेपी और शिवसेना जिस तरह से एक-दूसरे के ख़िलाफ़ आक्रामक रहे हैं, उसे देखते हुए तालमेल होना ही मुश्किल लगता है। शिवसेना महाराष्ट्र में बड़े भाई की भूमिका मान रही है और यह भूमिका उसे मिलने से रही। अगर ये तालमेल नहीं हुआ, तब तो बीजेपी को 23 और शिवसेना को 18 सीटें दोबारा मिल पाने की बात महज कल्पना ही होगी। तालमेल होता भी है, तो यह देखना जरूरी होगा कि कांग्रेस और एनसीपी के बीच किस हद तक तालमेल हो पाता है। अब तक की ख़बरों के अनुसार इन दोनों दलों के बीच 20-20 सीटों पर सहमति बन चुकी है। महज 8 सीटों पर तनातनी बरकरार है।
जिस तरह से महाराष्ट्र में यूपीए एकजुट है और एनडीए में गलतफहमी बरकरार है उसे देखते हुए ये निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि एनडीए के लिए अपना वर्तमान प्रदर्शन दोहराना मुश्किल होगा। राज्य और केंद्र सरकार के लिए एंटी इनकम्बेन्सी का सामना भी अलग से करना होगा।
जिन 6 राज्यों ने बीजेपी और एनडीए को सत्ता में पहुंचाया था, वहां वह अपनी वर्तमान स्थिति को बचाती हुई नहीं दिख रही है। सीटों की संख्या इतनी बड़ी है कि इसकी भरपाई कहीं और से होना नामुमकिन है। ऐसे में सिर्फ इन छह राज्यों में सम्भावनाओं के आधार पर ही ये कहा जा सकता है कि 2019 में बीजेपी के लिए डगर मुश्किल है।

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