Skip to main content

महानायक अमिताभ बच्चन ने जीता सबका दिल, 1348 किसानों का चुकाया करोड़ का कर्ज




मुंबई। बॉलीवुड के महानायक अमिताभ बच्चन ने उत्तर प्रदेश के एक हजार से अधिक किसानों का कर्ज चुकाया है। साथ ही वाराणसी समेत पूर्वांचल के 51 किसानों को अमिताभ ने मुंबई आमंत्रित किया और उनका कर्ज चुकता करने के साथ उन्हें मायानगरी के प्रमुख स्थानों का भ्रमण कराने के साथ ही रात्रि भोज भी कराया।
अमिताभ बच्चन और बैंक ऑफ इंडिया ने संयुक्त रूप से उत्तर प्रदेश के 27 जिलों के 1348 किसानों का लगभग 10 करोड़ रुपये कर्ज चुकाया। 51 किसानों को निजी तौर पर महानायक ने मुंबई आमंत्रित किया। 26 नवंबर को अमिताभ और उनकी बेटी श्वेता ने किसानों से मुलाकात कर बैंक के कागजात सौंपे। उन्हें ओटीएस (ओटीएस: वन टाइम सेटलमेंट विद बैंक ऑफ इंडिया) प्रमाणपत्र दिए।
बेटी श्वेता ने अपने हाथों से उनसब को OTS दिया ; बेटी घर की लक्ष्मी होती है  - लक्ष्मी के हाथों से लक्ष्मी दी।
वाराणसी के 10, चंदौली के 34 और भदोही के सात किसानों ने महानायक से मुलाकात की। अमिताभ ने ट्वीट कर इन किसानों का कर्ज चुकाने की जानकारी दी। बिग बी ने ट्वीटर पर लिखा कि उत्तर प्रदेश के किसानों से मुलाकात कर 1398 में से कुछ को ओटीएस प्रमाणपत्र दिए। उन्होंने कहा कि घर की लक्ष्मी, बेटी ने उन्हें ओटीएस प्रमाणपत्र सौंपे। बेटी श्वेता, हमारे घर की लक्ष्मी। उन्होंने अपने ब्लॉग पोस्ट में श्वेता के साथ कुछ तस्वीरें भी साझा कीं।
बैंक ऑफ इंडिया के जोनल कार्यालय के अंतर्गत आने वाले 27 जिलों के किसानों को कर्ज माफी के लिए चुना गया। आंचलिक प्रबंधक शंकर सेन की अगुवाई में प्रबंधक कृषि एवं वित्त विभाग आंचलिक कार्यालय, बैंक ऑफ इंडिया के विकास डे, अंबुज यादव, सिद्धार्थ तिवारी, अरविंद कुमार दुबे आदि कार्यक्रम में शामिल हुए। एनपीए खातों से जुड़े किसानों का कर्ज अदा किया गया। एलडीएम मिथिलेश कुमार ने बताया कि किसान व बैंककर्मी 28 नवंबर को वाराणसी लौट आएंगे।
आपको बता दें कि ये कोई पहला मौका नहीं है जब अमिताभ बच्चन ने किसानों का कर्ज माफ करने की ओर कदम बढ़ाया है। इससे पहले 2017 में अभिनेता ने 350 से अधिक किसानों का कर्ज चुकाने के साथ ही महाराष्ट्र के 44 शहीद जवानों के परिवारों की मदद की थी।

Comments

Popular posts from this blog

चार लोकसभा और 10 विधानसभा उपचुनाव के नतीजे थोड़ी देर में, कैराना सीट पर सबकी है नजर

 पालघर। देश के 4 लोकसभा और 10 विधानसभा सीटों पर सोमवार को हुए उपचुनाव के नतीजे आज बृहस्पतिवार को आएंगे। बृहस्पतिवार सुबह 8 बजे इन सभी सीटों पर मतों की गिनती शुरू हो चुकी है। इन सभी सीटों में से सबसे ज्यादा नजर उत्तर प्रदेश की कैराना लोकसभा सीट पर रहेगी। यहां बीजेपी को हराने के लिए विपक्षी पार्टियां रालोद उम्मीदवार का समर्थन कर रही हैं। 2019 लोकसभा चुनाव की ओर बढ़ रहे देश में विपक्षी पार्टियां कैराना में बीजेपी को हरा कर एक बड़ा संदेश देना चाहती हैं। सोमवार को हुए मतदान में काफी जगह ईवीएम-वीवीपैट में गड़बड़ी की खबरें आई थीं, जिसके बाद यूपी की कैराना, महाराष्ट्र की भंडारा-गोंदिया लोकसभा और नगालैंड की एक विधानसभा सीट के कुछ पोलिंग बूथों पर दोबारा वोट डलवाए गए थे। कैराना से भाजपा सांसद हुकुम सिंह और नूरपुर में भाजपा विधायक लोकेंद्र चौहान के निधन के कारण उप चुनाव हो रहे हैं। कैराना लोकसभा सीट के उपचुनाव पर देश के राजनीतिक दलों की निगाहें हैं। क्योंकि 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले हो रहे इस चुनाव की नतीजे देश की सियासत को नया संदेश देने वाले हैं। गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा सीट क...

महाराष्ट्र से वापस लौट सकेंगे प्रवासी मजदूर,डीएम की अनुमति होगी जरूरी

मुंबई। लॉकडाउन की वजह से देशभर में लॉकडाउन लागू है. अलग-अलग राज्यों के मजदूर और लोग दूसरे राज्यों में फंस गए हैं. महाराष्ट्र के गृह मंत्री अनिल देशमुख गुरुवार को कहा कि प्रवासी और अन्य फंसे हुए लोग अपने-अपने राज्यों में जिला मजिस्ट्रेट की अनुमति के बाद वापस लौट जाएंगे. जिला मजिस्ट्रेट ही प्रवासी मजदूरों को वापस भेजने के लिए नोडल अधिकारी की भूमिका में होंगे. लोगों को नाम, मोबाइल नंबर, गाड़ियों का विवरण(अगर हो तो), राज्य में अकेले हैं या साथ में हैं, इन सबका क्रमवार ब्यौरा देना होगा. महाराष्ट्र में लॉकडाउन की घोषणा के बाद लगभग 6 लाख मजदूर फंसे हैं. ये मजदूर बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड और ओडिशा के हैं. इस वक्त इन मजदूरों के रहने-खाने की जिम्मेदारी महाराष्ट्र सरकार पर है. हालांकि कुछ मजदूर अपने गृह राज्य जाने की मांग कर रहे हैं. अब गृह मंत्रालय की ओर से जारी नई गाइडलाइन के मुताबिक मजदूर अपने राज्यों को लौट सकेंगे. राज्य इसके लिए तैयारी कर रहे हैं. दरअसल बिहार, झारखंड, महाराष्ट्र जैसे कुछ राज्यों की मांग के बाद गृह मंत्रालय ने अलग-अलग स्थानों पर फंसे हुए प्रवासी मजदूरों, लोगों और ...

पीएम मोदी के कार्यकाल की सबसे बड़ी मुश्किल 18 फरवरी को आएगी

दिल्ली। देश के और सभी प्रधानमंत्रियों की तरह नरेंद्र मोदी भी जब प्रधानमंत्री बने, तो उन्होंने अपने मन मुताबिक कुछ फैसले किए. हर प्रधानमंत्री की तरह उन्हें भी समर्थन और विरोध झेलना पड़ा. हालिया सबसे बड़े फैसलों जैसे नोटबंदी और जीएसटी के बाद उनके समर्थन और विरोध का दौर जारी है. चुनाव में जीत के साथ ही विरोध की आवाज थोड़ी धीमी होती है और समर्थन की आवाज तेज हो जाती है. फिर अगला चुनाव आता है और फिर से यही प्रक्रिया दुहराई जाती है. नरेंद्र मोदी कोई पहले ऐसे प्रधानमंत्री नहीं हैं, जो इन मुसीबतों से दो चार हो रहे हैं. हर नेता के साथ यही होता रहा है. चाहे वो इंदिरा गांधी के बैंकों के राष्ट्रीयकरण का मसला हो, नरसिम्हा राव के मुक्त अर्थव्यवस्था का मसला हो या फिर मनमोहन सिंह का अमेरिका के साथ परमाणु करार का, चुनाव के दौरान विरोध बढ़ता ही रहा है. अगर चुनाव जीत गए तो आवाज दब जाती है और अगर हार गए तो इस आवाज को और भी बल मिलता है. कुछ ऐसी ही स्थिति आंदोलनों की भी होती है. कई ऐसे आंदोलन होते हैं, जो सरकारों को घुटने टेकने पर मजबूर कर देते हैं. वहीं कुछ आंदोलन मौसमी होते हैं. चुनावी मौसम में सिर...